जानिए कमल के फूल के बारे में: एक रहस्यमय और सुंदर वनस्पति
कमल के फूल की अनसुलझी रहस्यमयता
कमल - कमल और लक्ष्मी का सम्बन्ध अविभाज्य है कमल सृष्टी की वृद्धी का महत्त्वपूर्ण अंग है इसके पराग से मधुमख्खी शहद बनती है इसक्र फूल से तैयार गुलकंद का प्रयोग से कई प्रकार के रोग में तथा कब्ज के निवारण हेतु किया जाता है कमल के फूल के अन्दर हरे रंग के दाने निकलते है जिन्हें भुनकर मखाने बनाये जाते है लेकी उन दाने को कच्चा खाने से ओज एवं बल की वृद्धी होती है यह शीतल हिता है जिसके कारण इसका उपयोग अंजन की भांति आँखों की रौशनी बढाने के लिये शहद में मिला कर किया जाता है
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| कमल का फूल |
कमल पानी में पैदा होने वाली वनस्पति है। यह अत्यन्त नाजुक होता है। इसका प्रकाण्ड लता की तरह फैलने वाला होता है। इसके पत्ते गोल, बड़े-बड़े प्याले के आकार के तथा अरवी के पत्तों की तरह होते हैं। इन पत्तों पर पानी की बूँद नहीं ठहरती। ये चौड़े-चौड़े पत्ते थाली की तरह पानी में तैरते हुए दिखलायी देते हैं। पत्तों के नीचे जो डंडी होती है, उनको मृणाल अथवा कमल की नाल कहते हैं। कमल के पुष्प अत्यन्त सुन्दर और बड़े आकार के होते हैं। इन पुष्पों में जो पीला जोरा होता है उसको कमल-केशर कहते हैं। इसके पत्तों को पद्मकोष और बीजों को कमलगट्टे कहते हैं। कमल सफेद, लाल आदि रंगभेद से अनेक प्रकार के होते हैं।
यह शीतल और मधुर होता है तथा रक्त-विकार, विस्फोट, विसर्प और विष को दूर करने वाला होता है।
कमल के सभी अंगों द्वारा अनेक रोगों का उपचार
- नील कमल शीतल, सुस्वादु, पित्तनाशक, रुचिकारक, रसायन कर्म में उत्तम, देह की जड़ को दृढ़ करने वाला और बालों को बढ़ाने वाला होता है।
- रक्त कमल या लाल कमल चरपरा, कड़वा, मधुर, ठंडा, रक्तशोधक, पित्त, कफ और वात को शान्त करने वाला तथा वीर्यवर्धक है।
- सफेद कमल शीतल, स्वादिष्ठ, नेत्रों को लाभदायक तथा रुधिर विकार, सूजन, व्रण और सब प्रकार के विस्फोटकों को दूर करने वाला होता है।
- कमल के कोमल पत्ते शीतल एवं कड़वे होते हैं। ये शरीर की जलन को दूर करने वाले तथा प्यास, अश्मरी, बवासीर और कुष्ठ में लाभदायक होते हैं।

कमल का फूल - कमल की जड़ कड़वी, कफ-पित्त में लाभदायक और प्यास को बुझाने वाली होती है। इसके केशर शीतल, वीर्यवर्धक, संकोचक और कफ, पित्त, प्यास, विष, सूजन तथा खूनी बवासीर में लाभदायक हैं। इसके पुष्प शीतल, रक्तविकार, चर्म रोग और नेत्र रोग में लाभदायक हैं।
- कमल के बीज अर्थात् कमलगट्टे स्वादिष्ठ, रुचिकारक, पाचक, गर्भस्थापक, वीर्यवर्धक तथा पित्त, रक्तदोष,और रक्त पित्त को नाश करने वाले होते हैं। इसका शहद अत्यन्त पौष्टिक, त्रिदोषनाशक और सब प्रकार के वमन नेत्र रोगों को दूर करने वाला होता है।
निम्न बीमारी में कमल का प्रयोग और लाभ
- बवासीर - खूनी बवासीर में इसके केशर को शक्कर और मक्खन के साथ देने से लाभ होता है।
- गुदा द्वार के निगमन - कमल के कोमल पत्ते प्रातः शक्कर के साथ लेना चाहिये।
- गर्भ गिरने की शिकायत - जिन स्त्रियों को हमेशा गर्भ गिरने की शिकायत हो, उनके लिये इसके बीज बहुत ही लाभकर हैं।
- रक्तप्रदर - कमल की केशर, मुलतानी मिट्टी और मिश्री के चूर्ण की फंकी देने से रक्तप्रदर और रक्तार्श में लाभ होता है।
- गर्भस्त्राव - कमल की डंडी और नागकेशर को पीसकर दूध के साथ पिलानेसे दूसरे महीने में होनेवाला गर्भस्राव मिट जाता है।
- वमन – कमलगट्टेको आगपर सेंककर उसका छिलका उतारकर उसके भीतर का सफेद मगज पीसकर शहदमें चाटनेसे वमन बंद होती है।
- सर्प विष - कमलके मादा केशरको काली मिर्चके साथ पीसकर पीने और लगाने से साँप के विष में लाभ होता है।
- दाद - कमल की जड़ को पानी में घिसकर लेप करने से दाद और दूसरे त्वचा रोग मिटते हैं।
- हैजे की मायूस अवस्था - कमल गट्टे के बाहर जो हरी पत्ती रहती है, उसका अर्क गुलाब के अंदर घिसकर देने से हैजे की मायूस अवस्थामें लाभ होता है।
- रक्तातिसार युक्त पुराना ज्वर - रक्तातिसार युक्त पुराने ज्वरमें उत्पल, अनारका छिलका और कमल का केशर-ये तीनों बराबर-बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चावल के पानीके साथ लेना चाहिये।
- चेचक की बीमारी में - चेचक की बीमारी में इसके पुष्प का शान्तिदायक होता है।
- गुदा भ्रंश - सफेद कमल के पत्ते छोटे बच्चों के रोग के लिये बड़े लाभदायक होते हैं। इसके सुखाकर शक्कर के साथ देने से इस बीमारी में आर्यजनक परिणाम दृष्टिगोचर होता है।
- नेत्र रोग - कमलके फूलकी पँखड़ियोंको तोड़ते समय शहदके समान एक तरह का रस निकलता है, जिसको पद्म-मधु कहते हैं, इस मधु को नेत्र में आँजने से नेत्रों के अनेक रोग मिटते हैं।
- गर्भाशय से निकलने वाला खून - नील कमल, कमल और रक्त कमल के तन्तु २-२ तोला, मुलेठी २ तोला इन सब चीजों को लेकर १२७ तोला पानी और ३२ घी के साथ औटाना चाहिये। औटाते औटाते जब पानी जलकर घी मात्र शेष रह जाय तब उतारकर छान लेना चाहिये। इस घृतको उत्पलादि घृत कहते हैं। यह घृत खूनी बवासीर, रक्त प्रदर और गर्भाशय में से निकलने वाले खून को रोकने के लिये बड़ा अकसीर माना जाता है।
- जिस स्त्री को हमेशा गर्भपात होने का डर रहता है, उस स्त्री को गर्भपात के लक्षण शुरू होते ही फौरन यह घी देना चाहिये, इसके देने से गर्भपात रुक जाता है। इसी प्रकार इस घृत को पीने से और शरीर पर मालिश करने से विस्फोट और जलन वाले रोग मिटते हैं।

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